बुधवार 29 अप्रैल 2026 - 12:48
मीलाद ए सुलतान ए अरब व अजम 

इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) की शहादत का घाव अभी उनके आदरणीय पुत्र इमाम मूसा काज़िम (अ) के दिल में ताज़ा था, और उनके शियों पर भी मातम की चादर तनी हुई थी। मदीना मुनव्वरा अपने हक़ीक़ी इमाम, हज़रत सादिक़-ए-आले मुहम्मद (अ) के जुदाई के ग़म में इस तरह डूबा हुआ था कि मानो आसमान भी शर्मिंदा था, और सूरज, चाँद और सितारे भी अपनी रोशनी बिखेरने से असमर्थ महसूस कर रहे थे।

लेखक: मौलाना सय्यद अली हाशिम आबिदी

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी | इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स.) की शहादत का घाव अभी उनके आदरणीय पुत्र इमाम मूसा काज़िम (अ.स.) के दिल में ताज़ा था, और उनके शियों पर भी मातम की चादर तनी हुई थी। मदीना मुनव्वरा अपने हक़ीक़ी इमाम, हज़रत सादिक़-ए-आले मुहम्मद (अ.स.) के जुदाई के ग़म में इस तरह डूबा हुआ था कि मानो आसमान भी शर्मिंदा था, और सूरज, चाँद और सितारे भी अपनी रोशनी बिखेरने से असमर्थ महसूस कर रहे थे।

25 शव्वाल से लेकर 11 ज़िल क़ाद (148 हिजरी) तक, किसी के चेहरे पर मुस्कान के निशान नहीं थे। हर तरफ़ ग़म और उदासी का माहौल छाया हुआ था।

फिर 11 ज़िल क़ाद (148 हिजरी) का वह मुबारक दिन आया, जब गोया सूरज ने एक नए शान के साथ उदय किया और मदीना मुनव्वरा उस नूर-ए-सआदत से रौशन हो गया। इमाम मूसा काज़िम (अ.स.) के घर में एक शानदार जन्म की खबर ने माहौल को खुशियों से भर दिया।

यह वह संतान थी जिसका नाम "अली" रखा गया, जो बाद में दिलों के सुकून और इंसानियत के लिए रहमत और बरकत का स्रोत बने। यह जन्म गोया कायनात के दुखी दिल के लिए मरहम साबित हुआ।

हज़रत इमाम अली बिन मूसा अर-रज़ा (अ) का शुभ जन्म सभी अहल-ए-बैत (अ) के प्रेमियों के दिलों की खुशी और ईमान की ताज़गी का पैग़ाम है।

नबवी बशारत और रिज़वी जन्म

रिवायत है कि इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) की पत्नी और इमाम मूसा काज़िम (अ) की वालिदा माजिदा हज़रत हुमैदा (स) ने एक रात रसूल-ए-ख़ुदा (स) को सपने में देखा। आपने उनसे फरमाया कि नज्मा का विवाह अपने पुत्र मूसा (अ) से कर दो, क्योंकि उससे ऐसी संतान पैदा होगी जो रू-ए-ज़मीन के बेहतरीन इंसानों में से होगी। इसी बशारत के तहत हज़रत हुमैदा (स) ने हज़रत नज्मा (स) को इमाम मूसा काज़िम (अ) के निकाह में दे दिया।

इमाम मूसा काज़िम (अ) से भी रिवायत है कि आपने फरमाया: मेरे दादा और पिता ने सपने में मुझसे फरमाया: "ऐ मूसा! इस लौंडी से तुम्हारे बाद रू-ए-ज़मीन का बेहतरीन इंसान पैदा होगा, उसका नाम 'अली' रखना, क्योंकि अनक़रीब अल्लाह तआला उसके ज़रिए न्याय, रहमत और मेहरबानी ज़ाहिर करेगा। खुशनसीब है वह जो उसकी तस्दीक करे और विनाश है उसके लिए जो उसका इनकार और दुश्मनी रखे।"

इमाम अली रज़ा (अ) की ज़ियारत, इमाम सादिक़ (अ) की आरज़ू

इमाम अली बिन मूसा अर-रज़ा (अ) का शुभ जन्म, इमाम जाफ़र सादिक (अ) की शहादत के कुछ ही दिनों बाद हुआ, और यह वह समय था जब इमाम सादिक (अ) दिल की गहराइयों से इमाम मूसा काज़िम (अ) की संतान को देखने की तमन्ना रखते थे।

इमाम मूसा काज़िम (अ) से रिवायत है कि आपने फरमाया: मैंने अपने पिता जाफ़र बिन मुहम्मद (अ) से बारहा सुना कि वह फरमाया करते थे: "आलिम-ए-आले मुहम्मद (अ) तुमसे होगा, काश मैं उसे पा लेता। वह मेरे दादा अमीरुल मोमिनीन अली (अ.स.) का हमनाम होगा।" एक और रिवायत में है कि इमाम सादिक (अ) फरमाया करते थे: "अल्लाह तआला इस उम्मत का फरियादरस और मददगार मेरे पुत्र मूसा (अ) की नस्ल से ज़ाहिर करेगा।"

हज़रत इमाम रज़ा (अ) का जन्म, वालिदा की ज़बानी

हज़रत नज्मा खातून (स) फरमाती हैं: जब मेरे बेटे का जन्म हुआ तो उसने अपने दोनों हाथ ज़मीन पर रखे और सिर आसमान की तरफ़ बुलंद किया। उसके मुबारक होंट हिल रहे थे, वह कलाम फरमा रहा था लेकिन मैं समझ नहीं पाई। उसी लम्हा इमाम मूसा काज़िम (अ) तशरीफ़ लाए और फरमाया: "ऐ नज्मा! तुम्हें अल्लाह की करामत मुबारक हो।"

फिर मैंने नवजात को सफेद कपड़े में लपेटकर आपके सुपुर्द किया। इमाम (अ) ने उसके दाहिने कान में अज़ान और बाएं कान में इक़ामत कही और उसे आब-ए-फ़ुरात से मुतबर्रिक फरमाया। इसके बाद आपने बच्चे को मुझे वापस देते हुए फरमाया: "यह बच्चा मेरे बाद ज़मीन पर अल्लाह की हुज्जत है।"

इमाम रज़ा (अ) की फ़ज़ीलत

  1. ज्ञान और विद्या:
    अबू सल्त हरवी कहा करते थे: मैंने इमाम अली बिन मूसा अर-रज़ा (अ) से ज़्यादा ज्ञानी कोई व्यक्ति नहीं देखा। और हर वह विद्वान जिसने आपको देखा, उसने भी इसी बात का इक़रार किया। मामून अब्बासी विभिन्न मज़हबों और विचारधाराओं के विद्वानों को कई मजलिसों में इमाम रज़ा (अ) से मुनाज़िरे के लिए इकट्ठा करता था, लेकिन सब के सब इमाम (अ) के ज्ञान के सामने आजिज़ और मग़लूब हो जाते थे।

  2. शिष्टाचार और नैतिकता:
    इमाम अली रज़ा (अ) कभी भी किसी की बात बीच में नहीं काटते थे, और न ही किसी ज़रूरतमंद की गुज़ारिश को रद्द फरमाते थे। आप किसी के सामने टेक लगाकर नहीं बैठते थे और न ही अपने पैर फैलाकर बैठते थे। आपकी मुस्कान भी मुस्कुराहट तक सीमित होती थी।

    आप अपने गुलामों के साथ बहुत अच्छा व्यवहार करते, उन्हें हरगिज़ हकीर नहीं समझते, बल्कि उनके साथ एक ही दस्तरख़्वान पर खाना खाते। आप एक बड़ा प्याला दस्तरख़्वान के पास रखते और खाने में से बेहतरीन हिस्सा उसमें डाल देते, फिर हुक्म देते कि उसे मोहताजों में तकसीम कर दिया जाए।

  3. इबादत और बंदगी:
    इमाम अली रिज़ा (अ) रातों को बहुत कम सोते थे। रात के शुरुआती हिस्से से सुबह तक इबादत-ए-इलाही में मशग़ूल रहते। नमाज़-ए-फज्र के बाद सूरज निकलने तक ज़िक्र व इबादत में मसरूफ रहते, और तुलू-ए-आफ्ताब के बाद सजदे में चले जाते और सूरज के बुलंद होने तक उसी हालत में रहते।

    आप हर तीन दिन में एक बार क़ुरआन-ए-मजीद खत्म फरमाते, और यह तिलावत तदब्बुर और गौर के साथ होती थी। आप कसरत से रोज़े रखते और रात की तारीकी में सदक़ा दिया करते थे।

    आप अपने जमाने के सबसे ज़्यादा इबादतगुज़ार व्यक्ति थे, लेकिन इसके बावजूद इबादत को सिर्फ नमाज़ और रोज़े तक सीमित नहीं समझते थे। फरमाते थे: "इबादत ज़्यादा नमाज़ और रोज़ा नहीं, बल्कि ख़ुदा के अम्र में गहरी सोच और गौर ओ फिक्र है।"

इमामत; इमाम अली रज़ा (अ) की नज़र में

इमाम अली बिन मूसा अर-रज़ा (अ) ने मर्व की जामे मस्जिद में इमामत, इमाम के मक़ाम और मर्तबे और हुज्जत-ए-ख़ुदा की विभिन्न विशेषताओं को विस्तार के साथ बयान फरमाया। उनके इरशादात में से कुछ जुमले यह हैं:
"इमाम अल्लाह तआला की ज़मीन पर उसका अमीन होता है, उसके बंदों पर उसकी हुज्जत, उसके शहरों में उसका जानशीं, अल्लाह की तरफ़ दावत देने वाला और उसके दीन की हिफ़ाज़त करने वाला होता है। इमाम गुनाहों से पाक और आयबों से मुंबर्रा होता है। वह ज्ञान के साथ ख़ास और हिल्म ओ बर्दबारी से पहचाना जाता है। इमाम दीन का निज़ाम, मुसलमानों की इज़्ज़त, मुनाफ़िक़ों के लिए बाइस-ए-ग़ज़ब और काफ़िरों के लिए तबाही है। वह अपने ज़माने का यकता और बेमिसाल होता है। कोई उसके बराबर नहीं हो सकता, न कोई आलिम उसके हम-पल्ला हो सकता है। उसका कोई नज़ीर नहीं होता। हर फज़ीलत उसे अता की जाती है, चाहे उसने उसे तलब न भी किया हो। यह सब अल्लाह की तरफ़ से उसे अता होता है।"

इमाम रज़ा (अ) की ज़ियारत का सवाब

इमाम अली रज़ा (अ) ने अपने चाहने वालों को विलायत की तरफ़ राग़िब करने और इमाम-ए-मासूम के बुलंद मक़ाम से आगाह करने के लिए अपनी ज़ियारत का सवाब यूं बयान फरमाया:
"जो शख्स मेरी ज़ियारत करे, अल्लाह पर हक़ है कि मैं क़यामत के दिन उसकी ज़ियारत करूँ। ख़ुदा की क़सम! जो भी मेरे शियों में से मेरी क़ब्र के पास दो रकअत नमाज़ अदा करे, वह मग़फिरत का मुस्तहक़ हो जाता है।"

एक और मक़ाम पर आपने फरमाया:
"जो शख्स मेरी ज़ियारत करे, मैं क़यामत के दिन तीन मक़ामों पर उसके पास आऊंगा ताकि उसे क़यामत की सख्तियों से निजात दिलाऊं: जब आमालनामे दाएं और बाएं हाथ में दिए जाएंगे, जब पुल-ए-सिरात से गुज़रने का मरहला होगा, और जब आमाल को मीज़ान में तोला जाएगा।"

मआरिफ़-ए-रिज़वी के बहर-ए-ख़ज़्ज़ार के कुछ गोहर

  1. इंसान का दोस्त उसकी अक्ल है, और उसका दुश्मन उसकी नादानी है।

  2. जो शख्स अल्लाह की कम रोज़ी पर राज़ी हो जाए, अल्लाह उसके कम अमल पर राज़ी हो जाता है।

  3. ख़ामोशी हिकमत के दरवाज़ों में से एक दरवाज़ा है।

  4. लोगों के साथ मेहरबानी करना आधी अक्ल है।

  5. मोमिन में तीन ख़सलतें होनी चाहिएं: अल्लाह की सुन्नत: राज़दारी, रसूलुल्लाह (स.अ.व.व.) की सुन्नत: लोगों के साथ नरमी और इमाम की सुन्नत: मुश्किलों और आज़माइशों में इस्टिक़ामत व पाइंदारी

समापन

सलाम हो उस इमाम-ए-नूर पर, जिसकी बारगाह आज भी दिलों के अंधेरों को चाक करती है,
सलाम हो उस शम्सुश शुमूस पर, जिसकी ज़िया से ज़माने के ज़ख़्मों को मरहम मिलता है।

ऐ अली बिन मूसा अर-रिज़ा (अ.स.)! आपका हरम आज भी ग़ुरबत-ए-दिल का सबसे बड़ा सहारा है, आपका नाम आज भी फितनों के तूफ़ान में सुकून की आख़िरी पनाह है।

आज का इंसान एक बार फिर आज़माइशों के हिसार में है;
कहीं ज़ुल्म की सियासत है, कहीं ताक़त की कशमकश,
और कहीं उम्मत-ए-मुस्लिमा खुद अपने ही ज़ख़्मों पर बेहिसी और मुफाद परस्ती की चादर डाले खड़ी है।

ख़ित्ता-ए-इस्लाम बेचैनी में है, दिल बिखरे हुए हैं, और उम्मत की वहदत सवालिया निशान बनी हुई है।

ऐ इमाम-ए-ग़रीबुल ग़ुरबा!
आपकी तालीम हमें याद दिलाती है कि हक़ हमेशा ज्ञान, न्याय और बसीरत के साथ क़ायम रहता है,
और ज़ुल्म चाहे कितना ही ताक़तवर हो, आख़िरकार ज़वाल उसका मुकद्दर होता है।

दुनिया की बड़ी ताक़तों की कशमकश, पाबंदियों का दबाव, और सियासी मुफादों की जंगें
इंसानियत को फिर उसी मुक़ाम पर ले आई हैं जहाँ सच्चाई को पहचानना सबसे बड़ा इम्तिहान बन चुका है। और अफ़सोस कि बाज़ औक़ात वह उम्मत जिसे वहदत, उखुव्वत और रहमदिली का अलमबरदार होना चाहिए, वही अपनी दाखिली कमज़ोरियों, इख़्तिलाफात और सियासी मसलहतों में उलझकर अपने ही ज़ख्मों पर मरहम रखने से क़ासिर दिखाई देती है।

लेकिन ऐ इमाम-ए-रिज़ा (अ.स.)!
हमें आपके दर से उम्मीद मिलती है कि रौशनी कभी खत्म नहीं होती, अगर दिलों में इख़्लास बाकी रहे तो तारीकतरीन ज़माने भी बदल सकते हैं।

आपका पैग़ाम आज भी यही है कि ज्ञान, हिल्म, न्याय और ख़ुदा की तरफ़ रुजू।

सलाम हो आप पर, ऐ इमाम-ए-हिदायत!
सलाम हो आप पर, ऐ मज़लूमों के सहारा!
और सलाम हो आपके उस दर पर जो आज भी अहल-ए-दर्द के लिए पनाहगाह-ए-सुकून है।

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